डॉ. बाबा साहब भीमराव आंबेडकर भारतीय इतिहास के प्रमुख व्यक्तियों में से एक थे। जिन्होंने उपेक्षितों, शोषितों, दलितों, पिछड़ों, पीड़ितों  में सम्मानपूर्वक जीने की ललक जगाई। हज़ारों सालों से हो रहे शोषण और दमन के कारण, मानसिक रूप से मृत पड़ी जमात के मन में अपने अधिकारों के प्रति जो बिगुल फूका था, वह कारवां बनकर निरंतर बढ़ता जा रहा है।

शिक्षित बनो, संगठित बनो और संघर्ष करो की प्रेरणा

बाबासाहब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भारतीय समाज के शोषितों, पीड़ितों, दलितों और पिछड़ों को आह्वान करते हुए कहा “शिक्षित बनो! संगठित बनो! संघर्ष करो!” उन्होंने सिर्फ कहा ही नहीं बल्कि इसे अंजाम देने के लिए संस्थाओं और संगठनों का भी निर्माण किया। उनके द्वारा स्थापित संगठन और संस्थाएं हैं – सन् 1924 में बनी बहिष्कृत हितकारिणी सभा, सन् 1927 में समता सैनिक दल, सन् 1928 में डिप्रेस्ड क्लासेस एजुकेशन सोसायटी, सन् 1936 में स्वतंत्र लेबर पार्टी, सन् 1942 में अनुसूचित-जाति फेडरेशन, भारतीय बौद्ध महासभा आदि। इन संगठनों के माध्यम से उन्होंने लोगों को शिक्षित और संगठित करने का महती काम किया। उन्होंने पीपुल्स एजुकेशनल सोसाइटी के अंतर्गत 1946 में, बंबई में सिद्धार्थ महाविद्यालय और 1950 में औरंगाबाद में मिलिंद महाविद्यालय की स्थापना की। इसके साथ ही 1953 में,  बंबई में सिद्धार्थ वाणिज्य और अर्थशास्त्र महाविद्यालय एवं बंबई में, सिद्धार्थ विधि महाविद्यालय की स्थापना की। शिक्षा से सालों तक उपेक्षित समुदाय को शिक्षा का महत्त्व बताते हुए उन्होंने कहा, “शिक्षा वह शेरनी का दूध है जिसे जो पिएगा वह दहाड़ेगा”

दरअसल, अछूत समाज सिर्फ कहने के लिए हिन्दू था। उसे समाज में देवी-देवताओं के मंदिर में जाने तक की अनुमति नहीं थी। इसका असर हम आज आज़ादी मिलने के 70 साल बाद भी देखते हैं जो कभी अखबारों में सुर्खियां बन जाती है और कभी-कभी गांव-समाज में ही दबकर रह जाती है। ऐसे समय में डॉ. बाबा साहब भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में नासिक के ‘कालाराम मंदिर’ दर्शन के लिए दलितों ने आन्दोलन प्रारंभ किया। हज़ारों की संख्या में दलित मंदिर परिसर के पास पहुंचे और वहां के कर्मचारियों ने मंदिर के दरवाज़े बंद कर लिए। एक महीने के लिए दरवाज़े बंद रहे, लेकिन रामनवमी के दिन हर साल की तरह मूर्ति को रथ में बिठाकर जुलूस निकालना था। इसलिए मजिस्ट्रेट के सामने समझौता हुआ कि दलित और सवर्ण दोनों मिलकर जुलूस निकालेगें, कई दिनों के पश्चात् कालाराम मंदिर कानून बना और दरवाज़े दलितों के लिए खोल दिए गए।

डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने आजीवन अछूतों के अधिकार की लड़ाई लड़ी। वे हमेशा अपने निजी जीवन की परेशानियों को भूलकर दलितों, पिछड़ों, महिलाओं और वंचित समुदायों को सामाजिक न्याय दिलाने के लिए प्रयासरत रहें।

आज उन्हें विश्व के सबसे बड़े संविधान के निर्माता और ‘सिम्बल ऑफ नॉलेज’ के नाम से जाना जाता है। कहते हैं, 21वीं सदी बाबा साहब भीमराव अम्बेडकर की है। उनके लोकतान्त्रिक विचारों का असर समाज में, दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। आज डॉ. भीमराव अम्बेडकर का भारतीय समाज में वंचितों के सम्मान की लड़ाई शुरू करने के उनके अभूतपूर्ण योगदान के लिए, वे दलितों और पिछड़ों के लिए एक सूर्य समान हैं, जिनसे वे रोशनी, जीवन और उर्जा प्राप्त करते हैं।

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