भारत के रहस्यमय मंदिर, जिनकी सच्चाई जानकर दंग रह जाएंगे आप

भारत एक प्राचीनतम सभ्यता वाला सांस्कृतिक देश हैं। यह विश्व के उन गिने-चुने देशों में से एक है जहां हर वर्ग और समुदाय के लोग शांतिपूर्वक रहते हैं। यहां की भगौलिक स्थिति, जलवायु और विविध संस्कृति को देखने के लिए ही विश्व के कोने-कोने से पर्यटक पहुंचते हैं। भारत की प्राचीनतम मंदिरों की बनावट, विशेषता, महत्व और इतिहास आदि जानने के लिए ही पर्यटक बार-बार भारत की ओर रुख करते हैं। इनमें से कई मंदिर तो ऐसे भी हैं जो कई हजारों साल पुराने हैं और जिनके बारे में जानना पर्यटकों के लिए कौतुहल का विषय है।

#1. रामेश्वरम रामनाथस्वामी मंदिर

रामेश्वरम रामनाथस्वामी मंदिर हिंदुओं की आस्‍था का केंद है. यह पूरी बहुत प्रसिद्ध हैं. इस मंदिर की गाथाएं राम से जुड़ती हैं. माना जात है कि जब राम रावण रावण युद्ध के दौरान जब एक ब्राह्मण की मृत्यु हो गई तो राम ने पाप से बचने के लिए इस मंदिर का निर्माण कराया. राम ने हनुमान से दुनिया का सबसे बड़ा शिव लिंगम लाने को कहकर उन्हें हिमालय की ओर भेज दिया. यह मंदिर स्‍थापत्‍य कला का सुंदर नमूना है

#2. शक्तिपीठों, उत्तराखंड

शक्तिपीठों और धामों की इस भूमि पर कई मंदिर ऐसे भी हैं जो सालों साल से अपने वजूद की कहानी बयां कर रहे हैं। तो चल‌िए हम आपको बताते हैं ऐसे ही मंद‌िर के बारे में जो एक व्यक्ति ने, एक दिन में, एक ही औजार से बनाया है।

ये सुन कर भले ही आपको आश्चर्य हो रहा है, पर ये बात है एक दम सच है। इस मंदिर का नाम है ‘एक हथिया देवाल’। इस मंद‌िर को देखकर आप कभी यकीन ही नहीं कर पाएंगे क‌ि यह एक ही पत्‍थर से बना है।

उत्तराखंड के सीमान्त ज‌िला पिथौरागढ़ से तकरीबन 70 किलोमीटर दूर स्थित है थल कस्बे की ग्राम सभा बल्तिर में यह मंद‌िर है। यह एक श्रापित  मंदिर है। यह मंदिर शिव भगवान को समर्पित है लेकिन इस मंदिर में पूजा-पाठ करना वर्जित है।

जनश्रुत‌ियों के मुताबिक़ 12वीं शताब्दी में बने इस मंदिर के बारे में कहा जाता है क‌ि यह मंद‌िर नागर और लैटिन शैली की स्थापत्य कला का अनोखा संयोजन है। लेक‌िन इसमें एक ऐसी खामी है क‌ि आज तक यहां कोई पूजा नहीं कर पाता है। 

जी हाँ, मंदिर को देखने तो लोग दूर- दूर से पहुंचते हैं, परंतु पूजा-अर्चना निषेध होने के कारण केवल देख कर ही लौट जाते हैं। कहा जाता है क‌ि इस गाँव में एक मूर्तिकार था। एक बार किसी दुर्घटना में उसका एक हाथ कट गया। वह बहुत निराश हुआ पर हारा नहीं मानी। लेक‌िन गांव वालों ने उसका मजाक बनाया। इसल‌िए उसने एक द‌िन रात को छेनी, हथौड़ा लेकर गाँव के दक्षिणी की ओर निकल पडा। 

उसने एक चट्टान देखी और वहां रातों रात मंद‌िर खड़ा कर द‌िया। लेक‌िन तब यह ध्यान नहीं क‌िया क‌ि वह स्‍थान लोगों के शौच आ‌द‌ि के ल‌िए था। स्थानीय पंडितो ने उस मंदिर के अंदर उकेरी गयी भगवान शंकर के लिंग और मूर्ति को देखा तो कुछ खामिया पाई गईं। 

साथ ही मूर्त‌िकार ने जल्दबाजी में मंदिर के अंदर स्थापित शिवलिंग का अरघा विपरीत दिशा में बना दिया, जिसकी पूजा फलदायक नहीं होगी। ऐसी स्थिति को दोषपूर्ण माना जाता है और पूजा के बाद व‌िपर‌ीत पर‌िणाम होता है। इसके बाद मंदिर में पूजा नहीं की गई।

#3. निराई माता का मंदिर, छत्तीसगढ़

निराई माता का मंदिर-  यह मंदिर है निरई माता मंदिर। यह मंदिर छत्तीसगढ़ के गरियाबंद जिला मुख्यालय से 12 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर स्थित है। जिला मुख्यालय से 12 किमी दूर सोढूल, पैरी नदी के तट पर बसे ग्राम पंचायत मोहेरा के आश्रित ग्राम निरई की पहाड़ी पर विराजमान मां निराई माता श्रद्घालुओं एवं भक्तों का आकर्षण का केंद्र है।

यह मंदिर अंचल के देवी भक्तों की आस्था का मुख्य केंद्र है। निरई माता में सिंदूर, सुहाग, श्रृंगार, कुमकुम, गुलाल, बंदन नहीं चढ़ाया जाता। नारियल, अगरबत्ती, से माता को मनाया जाता हैं। देश के अन्य मंदिरों में जहां दिन भर मातारानी के दर्शन होते हैं वहीं यहां सुबह 4 बजे से सुबह 9 बजे तक यानि केवल 5 घंटे ही माता के दर्शन किए जा सकते हैं। केवल 5 घंटे के लिए खुलने वाले मंदिर में दर्शन करने हर साल हजारों लोग पहुंचते हैं।

इस देवी मंदिर की खासियत यह है कि यहां हर साल चैत्र नवरात्र के दौरान स्वत ही ज्योति प्रज्जवलित होती है। इस दैविय चमत्कार की वजह से लोग देवी के प्रति अपार श्रद्धा रखते हैं। कहा जाता है कि हर चैत्र नवरात्रि के दौरान देवी स्थल पहाड़ियों में अपने आप से ज्योति प्रज्वल्लित होती है। ज्योति कैसे प्रज्वल्लित होती है, यह आज तक पहेली बना हुआ है। ग्रामीणों की मानें तो यह निरई देवी का ही चमत्कार है कि बिना तेल के ज्योति नौ दिनों तक जलती रहती है।

ग्राम मोहेरा के पहाड़ी में माता निरई की ग्रामीण श्रद्धा-भक्ति से पूजा-अर्चना करते हैं। माता के भक्ति में लोगों को इतना विश्वास है कि इस पहाड़ी में माता निरई की मूर्ति है न मंदिर, फिर भी लोग श्रद्धा व विश्वास से इसे पूजते हैं। पहाड़ी पर मनोकामना जोत जलाते हैं। ग्रामीण बताते हैं कि माता निरई को लोग सिर्फ विश्वास से ही पूजते हैं। इसके पीछे 200 साल पुरानी मान्यता है। आज से दो सौ वर्ष पूर्व मोहेरा ग्राम के मालगुजार जयराम गिरी गोस्वामी ने निरई माता की पूजा करने बहुरसिंग ध्रुव के पूर्वजों को छ: एकड़ जमीन दान में दिए थे। जमीन में कृषि कर आमदनी से माता की पूजा पाठ जातरा संपन्न हो रहा है। बताया जाता हैं कि निरई माता मनोवांछित फल देने वाली है।

माता की कृपा से मनोकामना पूर्ण होने पर हजारों की संख्या में लोग यहां पूजा अर्चना करते हैं। यहां रायपुर, धमतरी, दुर्ग, भिलाई, मगरलोड, राजिम, छुरा, मैनपुर, देवभोग, गरियाबंद सहित अनेक जगहों से बड़ी संख्या में श्रद्वालु मन्नत मांगने पहुंचते हैं। प्राकृतिक छटा के बीच चारों ओर फैली पर्वत श्रृंखलाओं व पर्वत की चोटी पर स्थित निरई माता भक्तों को भय एवं दुखों से दूर रखती है।

निरई माता की उंची पहाड़ी में जातरा के एक सप्ताह पूर्व प्रकाश पुंज ज्योति के समान चमकता हैं। चैत नवरात्रि के प्रथम सप्ताह रविवार को जातरा मनाया जाता हैं। जातरा के दिन गरियाबंद, महासमुंद, रायपुर, धमतरी, कुरूद, मगरलोड, सिहावा, नयापारा, राजिम क्षेत्र के हजारों माता भक्तजन श्रध्दा पूर्वक दर्शन करने आते हैं। निरई माता का दर्शन पवित्र मन से किया जाता हैं। माता की बुराई या शराब सेवन किया हुआ व्यक्ति को मधुमक्खियों का कोप भाजन बनना पड़ता है।

क्षेत्र के प्रसिद्ध मां निरई माता मंदिर ग्राम मोहेरा में प्रति वर्ष चैत्र नवरात्र के प्रथम रविवार को जात्रा कार्यक्रम में श्रद्धालु जुटते है। वर्ष में एक दिन ही माता निरई के दरवाजे आम लोगों के लिए खोले जाते हैं। बाकी दिनों में यहां आना प्रतिबंधित होता है।

प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण सोंढूल और पैरी नदी के संगम के मुहाने पर पहाड़ी पर स्थित मां निरई में मन्नतें पूरी होने पर श्रद्धानुसार कुछ देने की परंपरा है। इस दिन यहां हजारों बकरों की बलि दी जाती है। मान्यता है बलि चढ़ाने से देवी मां प्रसन्न होकर सभी मनोकामना पूरी करती हैं, वहीं कई लोग मन्नत पूरी होने के बाद भेंट के रूप में जानवरों की बलि देते हैं। यहां जानवरों में खासकर बकरे की बलि की प्रथा आज भी जारी है।

इस मंदिर में महिलाओं को प्रवेश और पूजा-पाठ की इजाजत नहीं हैं, यहां केवल पुरुष पूजा-पाठ की रीतियों को निभाते हैं। महिलाओं के लिए इस मंदिर का प्रसाद खाना भी वर्जित है, खा लेने पर कुछ न कुछ अनहोनी हो जाती है।

आम जनता अपनी समस्या के निदान एवं मनवांछित वरदान प्राप्त करने दूर दराज से आते हैं। ग्राम पंचायत मोहेरा के पदाधिकारी सहित समस्त ग्रामवासी निरई माता के जातरा पर व्यवस्था में जुटे रहते हैं।

ग्राम पुरोहित के पूजा करने के बाद पट फिर सालभर के लिए बंद हो जाएगा।  श्रद्धालुओं की भीड़ को देखते हुए धमतरी और गरियाबंद पुलिस के जवानों का तैनात किया जाता है। सभी रोड में पुलिस की चाक-चौबंद व्यवस्था है।

#4. दिलवाड़ा जैन मंदिर, राजस्थान

दिलवाड़ा जैन मंदिर- दिलवाड़ा जैन मंदिर को राजस्थान का ताजमहल भी कहा जाता है। दिल को छू जाने वाली इस ऐतिहासिक धरोहर को लोग दिलवाड़ा का अजूबा कहते हैं। कहा जाता है कि यहां पर एक अवतारी पुरुष ने जन्म लिया था, स्थानीय मान्यताओं में उस अवतार को भगवान विष्णु का अंश माना जाता है। यह मंदिर कलाकृति और शिल्प का बेजोड़ नमूना हैं। इसे देखने के लिए लाखों लोग दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से आते हैं।

माउंट आबू में बना ये मंदिर दिलवाड़ा के जैन मंदिर के नाम से जाना जाता है। यहां कुल पांच मंदिरों का समूह जरुर है लेकिन यहां के तीन मंदिर खास हैं। आपको बता दें दिलवाड़ा का ये मंदिर 48 खंभों पर टिका हुआ है। इसकी खूबसूरती और नक्काशी के कारण इसे राजस्थान का ताज महल भी कहा जाता है। इस मंदिर की एक-एक दीवार पर बेहग सुंदर कालाकारी और नक्काशी की गई है, जो अपना इतिहास बताती हैं। इस मंदिर से जुड़ी कई कहानियां और कई मान्यताएं हैं, जो अपने आप में अनोखी है।

इस मंदिर से जुड़ी है पौराणिक कथा कहती है कि भगवान विष्णु ने बालमरसिया के रूप में अवतार लिया । कहा जाता है कि भगवान विष्णु का ये अवतार गुजरात के पाटन में एक साधारण परिवार के घर में हुआ। विष्णु भगवान के जन्म के बाद ही पाटन के महाराजा उनके मंत्री वस्तुपाल और तेजपाल ने माउंट आबू में इस मंदिर के निमार्ण की इच्छा जागी। जब भगवान विष्णु के अवतार बालमरसिया ने महाराज के यह बात सुनी तो वो वस्तुपाल और तेजपाल के पास इस मंदिर की रुपरेखा लेकर पहुंच गए। तब वस्तुपाल ने कहा कि अगर ऐसा ही मंदिर तैयार हो गया तब वो अपनी पुत्री की शादी बालमरसिया से कर देंगे। भगवान विष्णु के अवतार बालमरसिया ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया और बेहद सुंदर मंदिर का निर्माण किया।

पौराणिक कथा के अनुसार, बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने छल कर दिया और शादी करने के लिए एक और शर्त रख दी। उन्होंने शर्त रखी कि अगर एक रात में सूरज निकलने से पहले अपने नाखूनों से खुदाई कर मैदान को झील में तब्दील कर देंगे। तब वो अपनी पोती का हाथ बालमरसिया के हाथों में देंगी। यह सुन-कर उन्होंने एक घंटे में ही ऐसा करके दिखा दिया। फिर भी बालमरसिया की होने वाली दादीसास ने अपनी पोती का विवाह उनसे नहीं किया। बाद में इस बात को लेकर भगवान विष्णु कोध्रित हो उठे और उन्होंने अपनी होने वाली दादीसास का वध कर दिया।

दरअसल इस मंदिर का निर्माण गुजरात के सोलंकी राजा वीरध्वज के महामंत्री वस्तुपाल और उसके भाई तेजपाल ने करवाया था। इस मंदिर की देवरानी-जेठानी के गोखलों की कला दुनियाभर में प्रसिद्ध है। मंदिर का निर्माण 11वीं और 12वीं शताब्दी में किया गया था। दिलवाड़ा का ये शानदार मंदिर जैन धर्म के तीर्थकरों को समर्पित है। यहां के पांच मंदिरों के समूह में विमल वसाही सबसे प्राचीन मंदिर है जिसे 1031ईसवी में तैयार किया गया। 1231 में वस्तुपाल और तेजपाल दो भाईयों ने इसका निर्माण करवाया था। उस वक्त इस मंदिर को तैयार करने में 1500 कारीगरों ने काम किया था। वो भी कोई एक या दो साल तक नहीं, पूरे 14 सालों तक। इस मंदिर के निर्माण में उस वक्त करीब 12 करोड़ 53 लाख रूपए खर्च किए गए।

#5. टूटी झरना मंदिर, झारखंड

टूटी झरना मंदिर- भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर बेहद अद्भुत है क्योंकि यहां शिवलिंग का जलाभिषेक कोई और नहीं बल्कि स्वयं मां गंगा करती हैं। झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित टूटी झरना नामक इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग का जलाभिषेक साल के बारह महीने और चौबीसों घंटे स्वयं मां गंगा द्वारा किया जाता है। मां गंगा द्वारा शिवलिंग की यह पूजा सदियों से निरंतर चलती आ रही है। शिव भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में आकर अगर कोई व्यक्ति सच्चे दिल से कुछ मांगता है उसकी वह इच्छा जरूर पूरी होती है। स्थानीय लोगों के अनुसार वर्ष 1925 में अंग्रेजी सरकार ने इस स्थान पर रेलवे लाइन बिछाने के लिए खुदाई का कार्य आरंभ किया, तब उन्हें जमीन के अंदर कोई गुंबद के आकार की चीज नजर आई।

गहराई पर पहुंचने के बाद उन्हें पूरा शिवलिंग मिला और शिवलिंग के ठीक ऊपर गंगा की प्रतिमा मिली जिसकी हथेली पर से गुजरते हुए आज भी जल शिवलिंग पर गिरता है। यही वजह है कि यह रहस्यमय मंदिर आज भी आस्था का केन्द्र बना हुआ है।

महाभारत के युद्ध में पांडवों ने कौरवों को मारकर जीत तो हासिल कर ली थी लेकिन जीत मिलने के बाद वह प्रसन्न नहीं बेहद दुखी रहने लगे क्योंकि उन्हें प्रतिदिन अपने संबंधियों की हत्या का गम सताता रहता था और वह कुछ भी कर इस पाप से मुक्ति पाना चाहते थे।

पश्चाताप की आग में जलते हुए पांचों भाई श्रीकृष्ण की शरण में गए। कृष्ण ने उन्हें एक काली गाय और काला ध्वज दिया, साथ ही उनसे कहा कि ‘जिस स्थान पर गाय और ध्वज का रंग सफेद हो जाए उस स्थान पर शिव की अराधना करना, ऐसा करने से तुम्हें पाप से मुक्ति मिलेगी’।

पांडवों ने ऐसा ही किया और वे स्थान-स्थान भ्रमण करते रहे। अचानक एक स्थान पर जाकर गाय और ध्वज, दोनों का रंग सफेद हो गया। इसके बाद कृष्ण के कहे अनुसार उन्होंने वहां शिव की अराधना शुरू की। पांडवों की आराधना से भगवान शिव बेहद प्रसन्न हुए और उन्होंने पांचों भाइयों को अलग-अलग अपने लिंग रूप में दर्शन दिए। गुजरात की भूमि पर अरब सागर में इसी स्थान पर निष्कलंक महादेव का मंदिर स्थापित है।

#6. हडिंबा देवी मंदिर, हिमाचल प्रदेश

हडिंबा देवी मंदिर (हिमाचल प्रदेश): मनाली में हडिंबा देवी मंदिर, भारत के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इस मंदिर का आकर्षण इसकी संरचना है जिसे जापान की एक शैली ‘पगोडा’ से लिया गया है। यह पूरा मंदिर लकड़ी से बनाया गया है। पुरातत्वविदों की मानें तो इस मंदिर का निर्माण 1553 में किया था।

#7. शिव मंदिर , उत्तर प्रदेश (वाराणसी)

शिव मंदिर (वाराणसी, उत्तर प्रदेश): आपको जानकार हैरानी होगी कि इस मंदिर का निर्माण किसी पहाड़ या समतल जगह पर नहीं किया गया है। बल्कि यह मंदिर पानी पर बना है। कहने का अर्थ है कि यह शिव मंदिर आंशिक रूप से नदी के जल में डूबा हुआ है। बगल में ही सिंधिया घाट, जिसे शिन्दे घाट भी कहते हैं, इस मंदिर की शोभा बढ़ाता है। इस मंदिर में आध्यात्मिक कार्य नहीं होते और यह फिलहाल बंद है। इस मंदिर के बारे में जानने के लिए आज भी लोग जिज्ञासा रखते हैं।

#8. स्तंभेश्वर महादेव मंदिर, गुजरात

स्तंभेश्वर महादेव मंदिर (कावी, गुजरात): आप यह कल्पना नहीं कर सकते लेकिन यह बात सच है कि यह मंदिर पल भर के लिए ओझल हो जाता है और फिर थोड़ी देर बाद अपने उसी जगह वापिस भी जाता है। यह मंदिर अरब सागर के बिल्कुल सामने है और वडोदरा से 40 मील की दूरी पर है। खास बात यह है कि आप इस मंदिर की यात्रा तभी कर सकते हैं जब समुद्र में ज्वार कम हो। ज्वार के समय शिवलिंग पूरी तरह से जलमग्न हो जाता है।

#9. चाइनीज काली मंदिर, कोलकाता

चाइनीज काली मंदिर (कोलकाता): कोलकाता के टांगरा में एक 60 साल पुराना चाइनीज काली मंदिर है। इस जगह को चाइनाटाउन भी कहते हैं। इस मंदिर में स्थानीय चीनी लोग पूजा करते हैं. यहीं नहीं दुर्गा पूजा के दौरान प्रवासी चीनी लोग भी इस मंदिर में दर्शन करने आते हैं। यहां आने वालों में ज्यादातर लोग या तो बौद्ध हैं या फिर ईसाई। इस मंदिर की खास बात यह है कि यहां आने वाले लोगों को प्रसाद में नूडल्स, चावल और सब्जियों से बनी करी परोसी जाती है।

#10. ब्रह्मा मंदिर, राजस्थान (पुष्कर)

ब्रह्मा मंदिर (पुष्कर, राजस्थान): यह भगवान ब्रह्मा का एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसे पूरे विश्व में जाना जाता है। कहा जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब के शासन काल में मंदिरों को नष्ट करने के आदेश के बाद जो एकमात्र मंदिर बचा था वह यही है। इस मंदिर का निर्माण 14वीं शताब्दी में किया गया था. इसके निर्माण को लेकर कई रोचक कथाएं कही जाती हैं। मंदिर के बगल में ही एक मनोहर झील है जिसे पुष्कर झील के नाम से जाना जाता है। पुष्कर झील हिन्दुओं के एक पवित्र स्थान के रूप में जानी जाती है।

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