डॉ भीमराव अम्बेडकर ने हिंदू धर्म क्यों छोड़ा ?

14 अक्टूबर 1956 को आंबेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया था. वे देवताओं के संजाल को तोड़कर एक ऐसे मुक्त मनुष्य की कल्पना कर रहे थे जो धार्मिक तो हो लेकिन ग़ैर-बराबरी को जीवन मूल्य न माने।

‘यदि नई दुनिया पुरानी दुनिया से भिन्न है तो नई दुनिया को पुरानी दुनिया से अधिक धर्म की जरूरत है.’  डॉक्टर आंबेडकर ने यह बात 1950 में ‘बुद्ध और उनके धर्म का भविष्य’ नामक एक लेख में कही थी. वे कई बरस पहले से ही मन बना चुके थे कि वे उस धर्म में अपना प्राण नहीं त्यागेंगे जिस धर्म में उन्होंने अपनी पहली सांस ली है।

14 अक्टूबर 1956 को उन्होंने बौद्ध धर्म अपना लिया. आज उनके इस निर्णय को याद करने का दिन है. यह उनका कोई आवेगपूर्ण निर्णय नहीं था, बल्कि इसके लिए उन्होंने पर्याप्त तैयारी की थी।

भारत की संविधान सभा में बहस करते हुए, अपने साथी राजनेताओं की बातों में कुछ जोड़ते-घटाते आंबेडकर को सुनिए तो लगेगा कि कोई सहजज्ञानी राजनीतिक भिक्षु बोल रहा है. आप चाहें तो कांस्टीट्यूशनल असेंबली डिबेट्स को पढ़ सकते हैं. यह कोई अनायास नहीं है कि हमारे समय के महत्वपूर्ण इतिहासकार रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘मेकर्स आफ माडर्न इंडिया’ में आंबेडकर को ‘वाइज डेमोक्रेट’ कहते हैं.
आंबेडकर क्रांति के लिए तीन कारकों को जिम्मेदार मानते थे- इसके लिए व्यक्ति में न्यायविरुद्ध अहसास की उपस्थिति होनी चाहिए, उसे यह पता हो कि उसके साथ अनुचित व्यवहार किया जा रहा है और हथियार की उपलब्धता।

वे बताते हैं कि शिक्षा तक पहुंच को रोक दिया जाता है जिससे लोग विश्वास करने लगते हैं कि उनकी दुर्दशा पूर्व निर्धारित है. यह उनकी आर्थिक दशा को भी गिरा देती है. लोग शिकायत करना बंद कर देते हैं. अगर उनके पास शिकायत भी है तो उसे कार्य रूप में परिणत करने के किए हथियार नही उठा सकते हैं.

यहां आंबेडकर का नजरिया मार्क्सवादी लगता है लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि वे एक प्रशिक्षित अर्थशास्त्री थे जो राजनीति विज्ञान के सैद्धांतिक और व्यवहारिक धुरंधर भी. वर्ण व्यवस्था द्वारा संचालित समाज की हिंसा को उस आंबेडकर ने बहुत शिद्दत से सहा था जिसके पास देश और दुनिया का, अर्थव्यवस्था और राजनीति का गहन ज्ञान था, जिसके पास अपने समय के बेहतरीन विश्वविद्यालयों की सबसे ऊंची उपाधियां थीं.

गरीबी, बहिष्करण, लांछन से भरा बचपन मन के एक कोने में दबाये हुए आंबेडकर ने देखा था कि उनके जैसे करोड़ों लोग भारत में किस प्रकार का जीवन जी रहे हैं. उनके जीवन और आत्मा में प्रकाश शिक्षा ही ला सकती है. यही उन्हें उस दासता से मुक्त करेगी जिसे समाज, धर्म और दर्शन ने उनके नस-नस में आरोपित कर दिया है.

इस दासता को दलितों को अपनी नियति मान लेने को कहा गया था. आंबेडकर इसे तोड़ देना चाहते थे. वे देवताओं के संजाल को तोड़कर एक ऐसे मुक्त मनुष्य की कल्पना कर रहे थे जो धार्मिक तो हो लेकिन गैर-बराबरी को जीवन मूल्य न माने. इसलिए जब अक्टूबर 1956 में उन्होंने हिंदू धर्म से अपना विलगाव किया तो उन्होंने स्वयं और अपने अनुयायियों को बाइस प्रतिज्ञाएं करवाईं.

यह प्रतिज्ञाएं हिंदू धर्म की त्रिमूर्ति में अविश्वास, अवतारवाद के खंडन, श्राद्ध-तर्पण, पिंडदान के परित्याग, बुद्ध के सिद्धांतों और उपदेशों में विश्वास, ब्राह्मणों द्वारा निष्पादित होने वाले किसी भी समारोह न भाग लेने, मनुष्य की समानता में विश्वास, बुद्ध के आष्टांगिक मार्ग के अनुसरण, प्राणियों के प्रति दयालुता, चोरी न करने, झूठ न बोलने, शराब के सेवन न करने, असमानता पर आधारित हिंदू धर्म का त्याग करने और बौद्ध धर्म को अपनाने से संबंधित थीं।

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