शास्त्रों में नागराज वासुकी को नागलोक के राजा के रूप में जाना जाता है। कहते हैं कि समुद्र मंथन के दौरान वासुकी नाग को ही रस्सी के रूप में मेरु पर्वत के चारों ओर लपेटकर मंथन किया गया था और इसके साथ ही जब भगवान श्रीकृष्ण को कंस की जेल से चुपचाप वसुदेव उन्हें गोकुल ले जा रहे थे तब रास्ते में जोरदार बारिश हो रही थी। इसी बारिश और यमुना नदी के उफान से वासुकी नाग ने ही श्रीकृष्ण की रक्षा की थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार वासुकी ने भगवान शिव की सेवा में नियुक्त होना स्वीकार किया। कहते हैं कि तभी से भगवान शिव ने नागों के राजा वासुकी को अपने गले का हार बनाया।

शिव और सर्प की पौराणिक मान्यताएं:

शिव के गले में एक नाग हमेशा लिपटा होता है…जिसे हम वासुकी भी कहते हैं..शिव पुराण में बताया गया है कि, नागलोक के राजा शिव के परम भक्त थे…और सागर मंथन के समय उन्होंने रस्सी का काम किया था….जिससे सागर को मथा गया था…लिहाजा, इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर शिव ने अपने गले में आभूषण की तरह लिपटे रहने का वरदान दिया.

पौराणिक मान्यताओं में भगवान शंकर और सर्प का जुड़ाव गहरा है तभी तो वह उनके शरीर से लिपटे रहते है। कहते हैं कि अगर आपको भगवान शंकर के दर्शन ना हो और अगर सर्प के दर्शन हो जाएं तो समझिए कि साक्षात भगवान शंकर के ही दर्शन हो गए।

पुराणों अनुसार सभी नागों की उत्पत्ति ऋषि कश्यप की पत्नि कद्रू के गर्भ से हुई है। कद्रू ने हजारों पुत्रों को जन्म दिया था जिसमें प्रमुख नाग थे- अनंत (शेष),वासुकी, तक्षक, कर्कोटक, पद्म, महापद्म, शंख, पिंगला और कुलिक। कद्रू दक्ष प्रजापति की कन्या थीं।

शिव के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव श्मशान में निवास करते हैं, शरीर पर भस्म लगाते हैं और गले में नाग को धारण करते हैं। महादेव के इस स्वरूप में कहीं न कहीं गहरे रहस्य भी छिपे हैं। भगवान शिव के गले में लिपटा नाग इस बात का संकेत है कि भले ही कोई जीव कितना भी जहरीला क्यों न हो, पर्यावरण संतुलन में उसका भी महत्वपूर्ण योगदान है.

योग विज्ञान में, सर्प कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। यह आपके भीतर की वह उर्जा है, जो सुप्तावस्था में पड़ी है और इस्तेमाल नहीं हो रही है। शिव के साथ सर्प इस बात का प्रतीक है कि इंसान अगर अपनी भीतर की उर्जा यानि कुंडलिनी शक्ति को जागृत कर ले तो वो भी शिवत्व को प्राप्त हो सकता है। सांप एक जमीन पर रेंगने वाला जीव है। मगर शिव ने उसे अपने सिर पर धारण किया है। इससे यह पता चलता है कि आत्मा हो या परमात्मा कुंडलिनी शक्ति ही सर्वोपरि है ।

शिव के बारे में कहा जाता है कि भगवान शिव श्मशान में निवास करते हैं, शरीर पर भस्म लगाते हैं और गले में नाग को धारण करते हैं। महादेव के इस स्वरूप में कहीं न कहीं गहरे रहस्य भी छिपे हैं। भगवान शिव के गले में लिपटा नाग इस बात का संकेत है कि भले ही कोई जीव कितना भी जहरीला क्यों न हो, पर्यावरण संतुलन में उसका भी महत्वपूर्ण योगदान है। पुरातन समय से ही सांपों से जुड़ी कई मान्यताएं व किवंदतियां हमारे समाज में फैली हुई हैं। इन मान्यताओं के साथ कई अंधविश्वास भी हैं, जो सदियों से मनुष्य को डराते आ रहे हैं। महाशिवरात्रि (7 मार्च, सोमवार) के अवसर पर हम आपको सांपों से जुड़े कुछ ऐसे ही अंधविश्वासों के बारे में बता रहे हैं-

मान्यता है कि कुछ सांप इच्छाधारी होते हैं यानी वे अपनी इच्छा के अनुसार, अपना रूप बदल लेते हैं और कभी-कभी ये मनुष्यों का रूप भी धारण कर लेते हैं। जीव विज्ञान के अनुसार, इच्छाधारी सांप सिर्फ मनुष्यों का अंधविश्वास और कोरी कल्पना है। सांपों से जुड़ी एक मान्यता है कि कुछ सांप मणिधारी होते हैं यानी इनके सिर के ऊपर एक चमकदार, मूल्यवान और चमत्कारी मणि होती है। जीव विज्ञान के अनुसार, यह मान्यता भी पूरी तरह से अंधविश्वास है, क्योंकि दुनिया में अभी तक जितने भी प्रकार के सांपों के बारे में जानकारी प्राप्त हुई है, उनमें से एक भी सांप मणिधारी नहीं है। तमिलनाडु के इरुला जनजाति के लोग जो सांप पकड़ने में माहिर होते हैं वे भी मणिधारी सांप के होने से इनकार करते हैं।

मारे समाज में ऐसी मान्यता है कि यदि कोई मनुष्य किसी सांप को मार दे तो मरे हुए सांप की आंखों में मारने वाली की तस्वीर उतर आती है, जिसे पहचान कर सांप का साथी उसका पीछा करता है और उसको काटकर वह अपने साथी की हत्या का बदला लेता है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह मान्यता पूरी तरह से अंधविश्वास पर आधारित है, क्योंकि सांप अल्पबुद्धि वाले जीव हैं। सांपों का मस्तिष्क इतना विकसित नहीं होता कि ये किसी घटनाक्रम को याद रख सकें और बदला लें। जीव विज्ञान के अनुसार, जब कोई सांप मरता है तो वह अपने गुदा द्वार से एक खास तरह की गंध छोड़ता है, जो उस प्रजाति के अन्य सांपों को आकर्षित करती है। इस गंध को सूंघकर अन्य सांप मरे हुए सांप के पास आते हैं, जिन्हें देखकर ये समझ लिया जाता है कि अन्य सांप मरे हुए सांप की हत्या का बदला लेने आए हैं।

शिव, सर्प और विज्ञान:

हिंदू धर्म में सांप को दूध पिलाने का प्रचलन है, जो कि पूरी तरह से गलत है। जीव विज्ञान के अनुसार, सांप पूरी तरह से मांसाहारी जीव है। ये मेंढक, चूहा, पक्षियों के अंडे व अन्य छोटे-छोटे जीवों को खाकर अपना पेट भरते हैं। दूध इनका प्राकृतिक आहार नहीं है। नागपंचमी पर कुछ लोग नाग को दूध पिलाने के नाम पर इन पर अत्याचार करते हैं, क्योंकि इसके पहले ये लोग सांपों को कुछ खाने-पीने को नहीं देते। भूखा-प्यासा सांप दूध को पी तो लेता है, लेकिन कई बार दूध सांप के फेफड़ों में घुस जाता है, जिससे उसे निमोनिया हो जाता है और इसके कारण सांप की मौत भी हो जाती है।खेल-तमाशा दिखाने वाले कुछ लोग सांप को अपनी बीन की धुन पर नचाने का दावा करते हैं, जबकि ये पूरी तरह से अंधविश्वास है, क्योंकि सांप के तो कान ही नहीं होते। दरअसल ये मामला सांपों की देखने और सुनने की शक्तियों और क्षमताओं से जुड़ा है।

सांप हवा में मौजूद ध्वनि तरंगों पर प्रतिक्रिया नहीं दर्शाते पर धरती की सतह से निकले कंपनों को वे अपने निचले जबड़े में मौजूद एक खास हड्डी के जरिए ग्रहण कर लेते हैं। सांपों की नजर ऐसी है कि वह केवल हिलती-डुलती वस्तुओं को देखने में अधिक सक्षम हैं बजाए स्थिर वस्तुओं के। सपेरे की बीन को इधर-उधर लहराता देखकर नाग उस पर नजर रखता है और उसके अनुसार ही अपने शरीर को लहराता है और लोग समझते हैं कि सांप बीन की धुन पर नाच रहा है। कुछ लोग दो मुंह वाले सांप देखने का भी दावा करते हैं। जीव विज्ञान के अनुसार, किसी भी सांप के दोनों सिरों पर मुंह नहीं होते। हर सांप का एक ही मुंह होता है। कुछ सांपों की पूंछ नुकीली न होकर मोटी और ठूंठ जैसी दिखाई देती है। क्या उड़ने वाले सांप भी होते हैं? ऐसी बात भी हम कही न कहीं सुनते ही हैं, लेकिन इसमें कोई सच्चाई नहीं है। जीव विज्ञान के अनुसार, उड़ने वाले सांप नहीं होते। सांप की कुछ विशेष प्रजातियां होती हैं, जो अधिकांश समय पेड़ों पर ही रहती हैं। इस प्रजाति के सांपों में एक नैसर्गिक गुण होता है कि ये उछलकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर पहुंच जाते हैं, लेकिन इन पेड़ों की दूरी बहुत कम होती है। जब ये सांप उछलकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर जाते हैं तो ऐसी लगता होता है कि जैसे ये उड़ रहे हों। सच ये है कि सांप सरीसृप वर्ग के जीव हैं, इनके शरीर पर अपने जीवन की किसी भी अवस्था में बाल नहीं उगते।

कुछ लोग मानते हैं कि सांप की आंखों में किसी को भी सम्मोहित करने की शक्ति होती है यानी सांप जिसकी भी आंखों में देख लेता है वह मनुष्य या अन्य कोई प्राणी उस सांप के आदेश का पालन करता है। यह भी अंधविश्वास और कोरी कल्पना के अलावा कुछ नहीं है।

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