तुंगनाथ मन्दिर उत्तराखंड के गढ़वाल के चमोली ज़िले में स्थित है। यह मन्दिर भगभान शिव को समर्पित है और तुंगनाथ पर्वत पर अवस्थित है। 

हिमालय की ख़ूबसूरत प्राकृतिक सुन्दरता के बीच बना यह मन्दिर तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र है। मुख्य रूप से चारधाम की यात्रा के लिए आने वाले यात्रियों के लिए यह मन्दिर बहुत महत्त्वपूर्ण है।

स्थिति तथा निर्माण

यह मन्दिर समुद्र तल से लगभग 3,680 मीटर की ऊंचाई पर बना हुआ है। मन्दिर स्वयं में कई कथाओं को अपने में समेटे हुए है। 

कथाओं के आधार पर यह माना जाता है कि जब कुरुक्षेत्र के मैदान में पांडवों के हाथों काफ़ी बड़ी संख्या में नरसंहार हुआ, तो इससे भगवान शिव पांडवों से रुष्ट हो गये। 

भगवान शिव को मनाने व प्रसन्न करने के लिए पांडवों ने इस मन्दिर का निर्माण कराया। इस मन्दिर को 1000 वर्ष से भी अधिक पुराना माना जाता है। यहाँ भगवान शिव के ‘पंचकेदार’ रूप में से एक की पूजा की जाती है। 

ग्रेनाइट पत्थरों से निर्मित इस भव्य मन्दिर को देखने के लिए प्रत्येक वर्ष बड़ी संख्या में हज़ारों तीर्थयात्री और पर्यटक यहाँ आते हैं। 

तुंगनाथ मंदिर दुनिया का सबसे बड़ा शिव मंदिर है और रुद्रप्रयाग जिले में उत्तराखंड के  टुनगनाथ पर्वत की श्रृंखला में स्थित पंच केदार मंदिरों में सबसे ऊँचे स्थान पर है।

इस मंदिर में पुजारी मक्कामाथ गांव के एक स्थानीय ब्राह्मण हैं। यह भी कहा जाता है कि मैथानी ब्राह्मण इस मंदिर में पुजारी के तौर पर काम करते हैं। सर्दियों के मौसम के दौरान, मंदिर बंद हो जाता है।

मन्दिर से जुड़ी मान्यताएँ

इस मन्दिर से जुड़ी एक मान्यता यह प्रसिद्ध है कि यहाँ पर शिव के हृदय और उनकी भुजाओं की पूजा होती है। इस मन्दिर की पूजा का दायित्व यहाँ के एक स्थानीय व्यक्ति को है। 

समुद्र तल से इस मन्दिर की ऊंचाई काफ़ी अधिक है, यही कारण है कि इस मन्दिर के सामने पहाडों पर सदा बर्फ जमी रहती है। 

अन्य चार धामों की तुलना में यहाँ पर श्रद्वालुओं की भीड कुछ कम होती है, परन्तु फिर भी यहाँ अपनी मन्नतें पूरी होने की इच्छा से आने वालों की संख्या कुछ कम नहीं है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार भगवान राम ने जब रावण का वध किया, तब स्वयं को ब्रह्माहत्या के शाप से मुक्त करने के लिये उन्होंने यहाँ शिव की तपस्या की। तभी से इस स्थान का नाम ‘चंद्रशिला’ भी प्रसिद्ध हो गया।

प्राकृतिक सुन्दरता

तुंगनाथ मन्दिर केदारनाथ और बद्रीनाथ मन्दिर के लगभग बीच में स्थित है। यह क्षेत्र गढ़वाल हिमालय के सबसे सुंदर स्थानों में से एक है। 

वर्ष के जनवरी और फ़रवरी के महीनों में आमतौर पर बर्फ की चादर ओढ़े इस स्थान की सुंदरता जुलाई-अगस्त के महीनों में और भी अधिक बढ़ जाती है। 

इन महीनों में यहाँ मीलों तक फैले घास के मैदान और उनमें खिले फूलों की सुंदरता मनभावन होती है।

कथा कहती है कि महाभारत युद्ध के दौरान जब पांडवोंने अपने चचेरे भाई की हत्या की थी, तब व्यास ऋषि ने पांडवों को सलाह दी थी कि उनका यह कार्य केवल भगवान शिव द्वारा माफ़ किया जा सकता था। 

इसलिए पांडवों ने शिव से माफ़ी मांगने का निर्णय लिया लेकिन भगवान् शिव उनसे बहुत नाराज थे इसलिए उन्हें माफ़ नहीं करना चाहते थे। 

इसलिए पांडवों को दूर रखने के लिए, शिव ने एक बैल का रूप ले लिया और हिमालय को छोड़ कर गुप्तकाशी चले गए लेकिन पांडवों ने उन्हें पहचान कर वहा भी उनका पीछा किया था।

मन्दिर का मार्ग

मन्दिर तक जाने के लिए वे यात्री जो उखीमठ का रास्ता अपनाते हैं, उन्हें अलकनंदा के बाद मंदाकिनी घाटी में प्रवेश करना होता है। 

इस मार्ग पर अत्यंत लुभावने और सुंदर नज़ारे देखने को मिलते हैं। आगे बढ़ने पर अगस्त्य मुनि नामक एक छोटा-सा क़स्बा पड़ता है, जहाँ से हिमालय की नंदाखाट चोटी के दर्शन होते हैं।

देवहिरया ताल

चोपता से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद ‘देवहिरया ताल’ भी पहुँचा जा सकता है, जो तुंगनाथ मन्दिर के दक्षिण दिशा में स्थित है। यह एक पारदर्शी सरोवर है। 

इस सरोवर में चौखंभा, नीलकंठ आदि हिमाच्छादित चोटियों के प्रतिबिंब दिखायी देते हैं।

प्राचीन मन्दिरों के दर्शन

तुंगनाथ मन्दिर के प्रवेश द्वार पर चोपता की ओर बढ़ते हुए रास्ते में बांस के वृक्षों का घना जंगल और मनोहारी दृश्य दिखाई पड़ता है। 

चोपता से तुंगनाथ मन्दिर की दूरी मात्र तीन किलोमीटर ही रह जाती है। 

चोपता से तुंगनाथ तक यात्रियों को पैदल ही सफर तय करना होता है। पैदल यात्रा के दौरान बुग्यालों की सुंदर दुनिया से साक्षात्कार करने का अवसर मिलता है। 

इस दौरान भगभान शिव के कई प्राचीन मन्दिरों के दर्शन भी होते हैं। यहाँ से डेढ़ किलोमीटर की ऊँचाई चढ़ने के बाद ‘मून माउंटेन’ के नाम से प्रसिद्ध ‘चंद्रशिला’ नामक चोटी के दर्शन होते हैं।

लेकिन बाद में शिव ने अपने शरीर को बैल के शरीर के अंगों के रूप में पांच अलग-अलग स्थानों पर डाला, जहां पांडवों ने उनकी माफी और आशीषों की मांग करते हुए प्रत्येक स्थान पर भगवान शिव के मंदिरों का निर्माण किया।

तुंगनाथ को उस जगह के रूप में पहचाना जाता है जहां बाहू (हाथ) देखा गया था, कूल्हे केदारनाथ में देखा गया, रुद्रनाथ में सिर दिखाई दिया, उनकी नाभि और पेट मध्यमाहेश्वर में सामने आए और कल्पेश्वर में उनके जाट। 

पौराणिक कथा में यह भी कहा गया है कि रामायण महाकाव्य के मुख्य प्रतीक भगवान राम, चंद्रशेला शिखर पर ध्यान लगाते हैं, जो तुंगनाथ के करीब है। यह भी कहा जाता है कि रावण ने यहां भगवान् शिव की तपस्या की थी।

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